शनिवार, 27 जून 2020

वाह रे डर (कविता)


वाह रे डर।

वाह रे डर ,खुद से ज्यादा अपनो का डर है
डर है, अपनो के खो जाने का डर है
कुछ कह दिया कुछ बोल दिया तो क्या होगा
बेवजय बातो की राजनीति का डर है
कही राजनीति में न फस जाऊ इस बात का डर है
डर है, खुद की झूठी शान बचाने का डर है
डर है, खुद को कैसे बचाएंगे सच बोला तो
सच सुनता कौन है सुना तो साथ कौन देगा
वाह वाही घर बैठ सब करते है पर डर है...
डर है ,सच सामने न आ जाये इस बात का डर है
सच से रूबरू होना पागलपन ही तो है
पर डर है, खुद की गलतियों के बाहर आने का डर है
आज से ज्यादा कल के बनने बनाने का डर है
डर है, सच और झूठ के ताने बाने का डर है।
@tri....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें